Rajarani Temple (राजा रानी मंदिर): ओडिशा की खूबसूरत राजधानी भुवनेश्वर को पूरे भारत में ‘मंदिरों का शहर’ (City of Temples) कहा जाता है। इस ऐतिहासिक शहर का इतिहास 2000 वर्ष से भी पुराना है। यहाँ कई प्राचीन और भव्य मंदिर स्थित हैं, लेकिन इनमें से 11वीं शताब्दी का Rajarani Temple अपनी कलात्मक सुंदरता और अनूठी विशेषताओं के कारण सबसे प्रमुख और विख्यात है।

आमतौर पर यह मंदिर अपनी मुख्य मूर्ति के अभाव और दीवारों पर उकेरी गई सजीव कामुक कलाकृतियों के लिए दुनिया भर के पर्यटकों के बीच आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। आइए इस Ultimate Guide में राजा रानी मंदिर का इतिहास, इसकी भव्य वास्तुकला और इसके आस-पास के सभी रहस्यों को करीब से जानते हैं।

Rajarani Temple का इतिहास, वास्तुकला और अनोखे रहस्य
Rajarani Temple का इतिहास, वास्तुकला और अनोखे रहस्य

राजा रानी मंदिर का इतिहास (History of Rajarani Temple)

भुवनेश्वर का यह अद्भुत Rajarani Temple बेहद प्राचीन है। इतिहासकारों और विशेषज्ञों के अलग-अलग मतों के अनुसार:

  • प्रसिद्ध इतिहासकार फर्ग्यूसन का मानना ​​था कि इस भव्य मंदिर का निर्माण लगभग 1105 ईस्वी के आसपास शुरू हुआ था।
  • वहीं, जॉर्ज मिशेल और अन्य विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के समकालीन ही बना था।
  • यह मंदिर लगभग उसी काल का है जिस काल में पुरी का जगन्नाथ मंदिर बनकर तैयार हुआ था।

क्या था इसका पुराना नाम? ऐसा माना जाता है कि इतिहास में इस मंदिर को पहले ‘इंद्रेश्वर मंदिर’ के नाम से जाना जाता था और यह पूरी तरह से भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित था।

नाम के पीछे का असली रहस्य: क्यों पड़ा ‘राजा रानी’ नाम?

इस मंदिर को लेकर अक्सर लोगों में यह भ्रम रहता है कि इसका निर्माण किसी राजा और रानी ने करवाया था, लेकिन सच कुछ और ही है:

  1. अनोखा बलुआ पत्थर: इस मंदिर का निर्माण 10वीं और 11वीं शताब्दी के बीच अद्भुत लाल और सुनहरे बलुआ पत्थर से किया गया था।
  2. राजाराणि पत्थर: इस विशिष्ट बलुआ पत्थर को स्थानीय रूप से ‘राजाराणि’ पत्थर कहा जाता है। इसी पत्थर की वजह से इस पवित्र धाम को Rajarani Temple नाम मिला।
  3. ‘प्रेम मंदिर’ की उपाधि: मंदिर की बाहरी दीवारों पर महिलाओं और प्रेम-युगलों (Couples) की बेहद बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है, जिसके कारण इसे प्यार से ‘प्रेम मंदिर’ भी कहा जाता है।

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मंदिर की वास्तुकला और गर्भगृह का ढांचा

Rajarani Temple Bhubaneswar की वास्तुकला अत्यंत प्रभावशाली और कलिंग शैली का बेहतरीन उदाहरण है। यह एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है जिसमें दो मुख्य संरचनाएं हैं:

  • विमान (केंद्रीय गर्भगृह): मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है, लेकिन इसकी आंतरिक और बाहरी सतहों को इस प्रकार धंसाकर बनाया गया है कि यह बाहर से गोलाकार प्रतीत होता है। इसकी छत (शिखर) 18 मीटर (लगभग 59 फीट) की ऊंचाई तक फैली हुई है। इसके शिखर पर बनी छोटी-छोटी प्रतिकृतियां प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों की याद दिलाती हैं।
  • जगमोहन (दर्शन कक्ष/बरामदा): विमान के आगे एक दर्शन कक्ष है जिसे जगमोहन कहा जाता है। इसकी छत पिरामिडनुमा संरचना में निर्मित है और यह देखने में अत्यंत सरल और शांत है।

वास्तुकला का विकास: प्रारंभिक दोहरे मंदिरों में भुवनेश्वर के कुछ पुराने मंदिरों की तरह जगमोहन के आगे नट-मंडप या भोग-मंडप नहीं था, लेकिन बाद के समय में ओडिशा के मंदिरों में नट-मंडप (उत्सव कक्ष) और भोग-मंडप (अर्पण कक्ष) जैसी संरचनाएं जोड़ी जाने लगीं।

Reference: Rajarani Temple Wikipedia

Temple plan of Rajarani temple, scale 50 ft to 1 inch
Temple plan of Rajarani temple, scale 50 ft to 1 inch

आठ दिशाओं के रक्षक (The Eight Guardians of Directions)

इस मंदिर की एक बड़ी विशेषता इसके चबूतरे पर बनी ‘आठ दिशाओं के रक्षकों’ (अष्ट-दिक्पाल) की जीवंत मूर्तियां हैं। ‘देउल’ के प्रवेश द्वार के बाईं ओर से शुरू होकर दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में ये मूर्तियां इस प्रकार सजी हैं:

  • इंद्र (पूर्व): 33 वैदिक प्रकृति देवताओं के प्रमुख।
  • अग्नि (दक्षिण-पूर्व): वैदिक अग्नि के देवता।
  • यम (दक्षिण): मृत्यु और न्याय के देवता।
  • निरृति (दक्षिण-पश्चिम): दुख और संकट से संबंधित देवी।
  • वरुण (पश्चिम): समुद्र और जल के वैदिक देवता।
  • वायु (उत्तर-पश्चिम): पवन और वायु के देवता।
  • कुबेरा (उत्तर): धन के देवता, जिन्हें यहाँ एक अनोखे मनोकामना पूरी करने वाले वृक्ष के साथ दर्शाया गया है।
  • ईशान (उत्तर-पूर्व): भगवान शिव का एक पवित्र रूप।
The front portion of the jagamohana depicts nagins and guarding deities in the doorjambs, with vimana in the background.
The front portion of the jagamohana depicts nagins and guarding deities in the doorjambs, with vimana in the background.

मंदिर की मूर्तियां और शैव धर्म से संबंध

भले ही आज मंदिर के गर्भगृह में कोई मुख्य मूर्ति स्थापित नहीं है, लेकिन इसकी दीवारों पर उकेरी गई शैलियां और आकृतियां अत्यंत ऊर्जावान और जीवंत हैं। यहाँ रोजमर्रा की जिंदगी के आकर्षक दृश्य दर्शाए गए हैं, जैसे:

  • अपनी गोद में छोटे बच्चे को लिए स्नेह करती एक माँ।
  • दर्पण (Mirror) में अपना रूप और प्रतिबिंब निहारती सुंदर महिलाएं।

शैव धर्म के मजबूत प्रमाण: मंदिर के मुख्य अग्रभाग (Facade) पर तीन पैनल बने हैं जिनमें भगवान शिव को अपनी पत्नी माता पार्वती के साथ नृत्य करते हुए और वाद्ययंत्र बजाते हुए दर्शाया गया है। इसके अलावा, प्रवेश द्वार पर जटामुख धारण किए हुए शैव द्वारपाल ‘प्रचंड और चंदा’ की उपस्थिति और खोपड़ियों की माला यह साफ प्रमाणित करती है कि यह प्राचीन काल में एक मुख्य शैव तीर्थस्थल था।

राजा रानी संगीत महोत्सव (Rajarani Music Festival)

भारतीय शास्त्रीय संगीत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने के लिए ओडिशा पर्यटन विभाग द्वारा ‘ओडिशा संगीत नाटक अकादमी’ के सहयोग से हर साल जनवरी माह में इस मंदिर के सुंदर प्रांगण में राजारानी संगीत महोत्सव आयोजित किया जाता है।

यह तीन दिवसीय संगीत समारोह शास्त्रीय संगीत की समृद्धि का जश्न मनाने का एक अनूठा अवसर है। जब देश के महान उस्ताद शाम के समय यहाँ अपनी प्रस्तुतियां देते हैं, तो पूरा वातावरण मनमोहक धुनों और घंटियों की ध्वनि से गूंज उठता है।< h2 class="wp-block-heading">मंदिर की टाइमिंग और प्रवेश शुल्क (Timings & Entry Fee)

  • समय: यह मंदिर सप्ताह के सभी दिन सुबह 06:00 बजे से शाम 06:00 बजे तक खुला रहता है।
  • घूमने का सबसे अच्छा समय: अक्टूबर से मार्च के बीच (सर्दियों का मौसम)।
  • प्रवेश शुल्क: भारतीय पर्यटकों के लिए मात्र ₹5 और विदेशी आगंतुकों के लिए ₹100 निर्धारित है।

भुवनेश्वर के अन्य 8 प्रमुख आस-पास के मंदिर

अगर आप Rajarani Temple देखने आ रहे हैं, तो आपको भुवनेश्वर के इन 8 ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन भी ज़रूर करने चाहिए:

1. लिंगराज मंदिर (Lingaraj Temple)

इसका निर्माण 7वीं शताब्दी में शासक ययाति केसरी ने करवाया था। इसका भव्य शिखर लगभग 180 फीट ऊंचा है और परिसर में 64 से अधिक छोटे मंदिर हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने पार्वती जी को बताया था कि भुवनेश्वर (एकमरा तीर्थ) उन्हें बनारस से भी अधिक प्रिय है। यहाँ प्रतिदिन 22 पूजा-अर्चनाएं की जाती हैं।

2. मुक्तेश्वर मंदिर (Mukteswar Temple)

950 ईस्वी में स्थापित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसका भव्य ‘तोरण’ (मेहराबदार प्रवेश द्वार) बौद्ध धर्म के प्रभाव को दर्शाता है। यहाँ दीवारों पर ध्यान मुद्राओं में बैठे तपस्वियों के साथ-साथ पंचतंत्र की लोक कथाओं और जैन मुनियों की आकृतियां उकेरी गई हैं।

3. ब्रह्मेश्वर मंदिर (Brahmeswara Temple)

9वीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर अपनी जटिल आंतरिक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण सोमवंशी राजा उद्योतकसरी की माता कोलवती देवी ने करवाया था। इसके पश्चिमी भाग पर तांत्रिक विद्या से संबंधित कई भयावह और चमत्कारी मूर्तियां बनी हुई हैं।

4. चौसती योगिनी मंदिर (Chausathi Yogini Temple)

काले क्लोराइट पत्थर से निर्मित यह मंदिर भारत के गिने-चुने योगिनी मंदिरों में से एक है। यह तांत्रिक प्रथाओं और अलौकिक शक्तियां प्राप्त करने की मान्यताओं से जुड़ा हुआ है, जहाँ महामाया की 64 परिचारिकाओं (योगिनियों) की पूजा की जाती है।

5. केदार गौरी मंदिर (Kedar Gauri Temple)

यह भुवनेश्वर के सबसे प्राचीन देवस्थानों में से एक है जो केदारेश्वर (शिव) और देवी गौरी को समर्पित है। हर साल ‘शीतल षष्ठी’ उत्सव के दौरान भगवान लिंगराज की बारात यहाँ आती है और माता पार्वती के साथ उनका विवाह संपन्न होता है।

6. वैताल देउल मंदिर (Vaital Deula)

बिंदु सरोवर के पास स्थित यह 8वीं शताब्दी का एक प्रसिद्ध तांत्रिक तीर्थस्थल है। यहाँ की मुख्य देवी माँ चामुंडा (दुर्गा का तांत्रिक रूप) हैं, जिन्हें लाल जीभ बाहर निकाले और खोपड़ियों की माला पहने दर्शाया गया है। यहाँ रथ चलाते हुए अर्जुन का चित्र भी दर्शनीय है।

7. रामेश्वर देउला (Rameshwar Deula)

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम रावण पर विजय प्राप्त करके लंका से लौट रहे थे, तब माता सीता की इच्छा पर उन्होंने स्वयं यहाँ एक शिवलिंग का निर्माण कर शिव आराधना की थी। 9वीं शताब्दी के इस मंदिर के गर्भगृह में मां दुर्गा की भी पूजा की जाती है।

8. यमेश्वर मंदिर (Yameswar Temple)

कोमल बलुआ पत्थर से बना यह प्राचीन मंदिर भारती मठ के पास स्थित है। मान्यता है कि यहाँ स्वयं यमराज ने भगवान शिव की आराधना की थी। इसकी आठ दिशाओं में मां दुर्गा के आठ रूप स्थापित हैं: मारिचिका, विमला, अर्धासिनी, कालरात्रि, बत मंगल, लम्भा, चंदरूपा और सर्व मंगल।

यहाँ कैसे पहुँचें: सड़क, रेल और हवाई मार्ग

  • हवाई मार्ग द्वारा: सबसे नज़दीकी बीजू पटनायक हवाई अड्डा मंदिर से मात्र 6 किमी दूर है, जो दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, हैदराबाद और वाराणसी जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
  • ट्रेन द्वारा: भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन भी केवल 6 किमी की दूरी पर स्थित है। यह हावड़ा-चेन्नई मुख्य मार्ग पर होने के कारण देश की सभी प्रमुख ट्रेनों (जैसे राजधानी एक्सप्रेस, कोरोमंडल एक्सप्रेस) का मुख्य स्टॉप है।
  • सड़क मार्ग द्वारा: शहर का बरमुंडा बस स्टैंड मुख्य कनेक्टिंग पॉइंट है। आप पुरी से पिपली होते हुए भी आसानी से यहाँ के लिए बसें या कैब ले सकते हैं।

भुवनेश्वर में ठहरने के लिए 10 सबसे बेस्ट होटल्स

यदि आप अपनी यात्रा के दौरान रुकने के लिए अच्छे विकल्पों की तलाश में हैं, तो ये टॉप होटल्स आपके लिए बेस्ट रहेंगे:

  1. हॉटेल ग्रैंड सेंट्रल – ओल्ड स्टेशन रोड
  2. होटल अरविंद इन – जनपथ, बापूजी नगर
  3. जिंजर भुवनेश्वर – जयदेव विहार, नयापल्ली
  4. होटल सैंडिस टॉवर – जयदेव विहार
  5. द क्राउन – आईआरसी विलेज, नयापल्ली
  6. होटल शिशमो – गौतम नगर
  7. द न्यू मैरियन – जनपथ
  8. होटल शीतल – वाणी विहार स्क्वायर
  9. होटल पार्क रिज़ॉर्ट – कटक-पुरी रोड
  10. पाल हाइट्स – जयदेव विहार

प्रसिद्ध उड़िया व्यंजन और खाने की बेहतरीन जगहें

भुवनेश्वर यात्रा के दौरान आपको यहाँ के पारंपरिक और प्रामाणिक उड़िया भोजन (Odia Cuisine) का स्वाद ज़रूर चखना चाहिए। मंदिरों में मिलने वाला ‘आबाधा’ (महाप्रसाद/शाकाहारी भोजन) बेहद स्वादिष्ट होता है।

  • मुख्य व्यंजन: माछा झोलो (मछली करी), गुपचुप, कटक चाट, आलू दम, दही पखाल, बड़ी चूरा, दालमा और संतूला।
  • प्रसिद्ध मिठाइयाँ: पीठा, कोरा-खाई, रसबाली, छेना गजा, छेना पोड़ा और विश्वप्रसिद्ध रसगुल्ला।

खाने के लिए टॉप रेस्तरां:

  • हरे कृष्णा रेस्तरां – लालचंद मार्केट कॉम्प्लेक्स, जनपथ (शुद्ध शाकाहारी के लिए बेस्ट)
  • जायका – लुईस रोड, इलाहाबाद बैंक के सामने
  • जनक रेस्तरां – होटल जनपथ, बापूजीनगर
  • गोल्डन बर्ड – होटल पुष्पक, कल्पना स्क्वायर
  • टेंजेरीन 9 – मास्टर कैंटीन एरिया, खरबेला नगर

Frequently Asked Questions (FAQs) – राजा रानी मंदिर

क्या राजा रानी मंदिर में कोई मूर्ति है?

नहीं, वर्तमान में राजा-रानी मंदिर के गर्भगृह में किसी भी देवी या देवता की कोई मूर्ति नहीं है और न ही यहाँ कोई पारंपरिक पूजा होती है। हालाँकि, इसकी दीवारों पर बने चित्र इसके शैव धर्म से जुड़े होने का पक्का प्रमाण देते हैं।

राजा रानी मंदिर को ‘प्रेम मंदिर’ क्यों कहा जाता है?

इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर प्राचीन शिल्पकारों द्वारा सुंदर अप्सराओं, नायिकाओं और प्रेम-युगलों (Mituna/Erotic Sculptures) की बेहद जीवंत और आकर्षक आकृतियां उकेरी गई हैं, जिसके कारण इसे प्रेम मंदिर भी कहा जाता है।

राजारानी संगीत महोत्सव कब आयोजित होता है?

यह प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत महोत्सव हर साल जनवरी के महीने में ओडिशा पर्यटन विभाग द्वारा मंदिर के खुले और हरे-भरे प्रांगण में आयोजित किया जाता है।