चालबाज शिष्य (मूर्ख ऋषि) – पंचतंत्र कहानी (हिंदी)
बहुत समय पहले, एक छोटे से आश्रम में एक वृद्ध ऋषि अपने शिष्यों के साथ रहते थे। ऋषि का हृदय दयालु था और वे हर किसी पर विश्वास कर लेते थे। उनके शिष्यों में से एक बहुत ही चालाक और कपटी स्वभाव का था। वह हर समय अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए गुरु की सरलता का फायदा उठाता रहता।
गुरु का भरोसा
ऋषि अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे कि “सच्चाई और ईमानदारी सबसे बड़ा धर्म है।” लेकिन चालबाज शिष्य यह सब सुनकर भी अपने स्वभाव से बाज नहीं आता। वह गुरु की आँख बचाकर लोगों से दान में मिली वस्तुएँ छुपा लेता और अपने लिए रख लेता।
गुरु की मूर्खता
ऋषि इतने भोले थे कि उन्हें कभी संदेह नहीं हुआ। एक दिन एक धनी व्यापारी ने आश्रम में आकर एक सुंदर गाय दान दी और कहा,
“गुरुदेव, यह गाय आपके शिष्यों के काम आएगी। इसका दूध सबके लिए उपयोगी होगा।”
ऋषि ने उस गाय की देखभाल का जिम्मा उसी चालाक शिष्य को सौंप दिया।
चालबाज शिष्य की योजना
शिष्य ने सोचा, “गाय मेरे पास है, क्यों न इसका दूध बेचकर पैसा कमा लूँ।” उसने ऐसा करना शुरू कर दिया। रोज़ वह दूध बाज़ार में बेचकर अपना लालच पूरा करता।
सच का पर्दाफाश
कुछ ही दिनों में बाकी शिष्यों ने ध्यान दिया कि गाय तो है, लेकिन आश्रम में दूध कभी पहुँचता ही नहीं। उन्होंने चुपके से चालबाज शिष्य का पीछा किया और उसकी करतूत पकड़ ली।
वे सब मिलकर ऋषि के पास पहुँचे और सारी सच्चाई बता दी।
ऋषि की सीख
ऋषि यह सुनकर बहुत दुखी हुए। उन्हें अपनी मूर्खता का एहसास हुआ और उन्होंने सबको बुलाकर कहा,
“जो व्यक्ति दूसरों के भरोसे के साथ छल करता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता। और जो गुरु बिना परखे शिष्य पर आँख मूँदकर विश्वास करता है, वह भी मूर्ख कहलाता है।”
चालबाज शिष्य को आश्रम से निकाल दिया गया।
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कहानी से शिक्षा (Moral of the Story)
- बिना परखे किसी पर आँख मूँदकर विश्वास करना मूर्खता है।
- छल और कपट करने वाले का अंत बुरा ही होता है।
- गुरु और शिष्य का रिश्ता भरोसे और सच्चाई पर टिका होना चाहिए।
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The Cunning Disciple (The Foolish Sage) – Panchatantra Story (English)

Long ago, in a small hermitage, lived an old sage with his disciples. The sage was kind-hearted and trusted everyone easily. Among his disciples, there was one very cunning and selfish man who always tried to take advantage of the sage’s innocence.
The Sage’s Trust
The sage always taught, “Truth and honesty are the greatest virtues.” But the cunning disciple ignored these teachings and secretly kept the donations for himself. One day, a wealthy merchant donated a beautiful cow to the hermitage and said, The sage, in his innocence, handed over the responsibility of the cow to the cunning disciple. The disciple thought, “The cow is under my care, why not sell the milk and earn money for myself?” He started selling the milk in the market every day. Soon, the other disciples noticed that though the cow was there, no milk ever reached the hermitage. They secretly followed the cunning disciple and discovered his deceit. They immediately reported everything to the sage. The sage was heartbroken. He realized his foolishness and said, The cunning disciple was expelled from the hermitage. Q1. इस कहानी की मुख्य शिक्षा क्या है? Q2. यह कहानी बच्चों को क्यों सुनानी चाहिए? Q3. यह कहानी कहाँ से ली गई है? The Sage’s Foolishness
“Respected sage, this cow will be useful for all your disciples. Its milk will keep everyone healthy.” The Disciple’s Trick
Truth Exposed
The Sage’s Realization
“One who betrays trust can never be happy. And a guru who blindly trusts without testing is also a fool.” Moral of the Story
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
👉 बिना सोचे-समझे किसी पर आँख मूँदकर भरोसा करना नुकसानदेह हो सकता है।
👉 यह बच्चों को ईमानदारी और सच्चाई की अहमियत सिखाती है।
👉 यह पंचतंत्र की प्राचीन कहानियों से प्रेरित है।

